Hindi Quote in Poem by Urmi Chauhan

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एक दौर आया समाज में

गरीब पिताजी की बेटियाँ
सुशिल, सुन्दर और गुणवान
बियाही गई धनवान खानदानो में
उम्र कच्ची, चल पड़ी अपने
खिलोने लेकर खुशिया छोड़ ससुराल

माहौल बदला सोला साल की
कन्या चली सहेली संग
देखा किसीने खिलखिला कर हस्ते उसे
तवंगर घर मिलना हुआ मुश्किल
क्युकी लड़की घूमती फिरती थी
किसी साधारण पुरुष के गले पहनाई वरमाला

धीरे धीरे समय बदला, दी गई छूट पढ़ने की सातवीं तक
अब कोई पढ़ा लिखा अफसर चाहता था
लड़की घर का काम जानती हो
साथ ही पाई पाई का हिसाब रखे
ताकि फ़िज़ूल खर्ची न हो

एक नया दौर भी आया जब दी गई आज़ादी
उन दो चार लड़को में से किसी एक को चुनना
यह आज़ादी चुनाव के साथ ख़त्म होकर
ज़िम्मेदारियों से शुरू होती

कही महिला सशक्तिकरण के नारे, तो कही सहनशक्ति की मूर्ति
आई सामने उन सरे जुर्म का दुखड़ा लेकर
कभी आत्मनिर्भर बनकर दिखाया
तो कभी परिवार में रहकर भी अपना समय निकाला

अब सोचना की यह तो समय की मांग और
मिल भी रही है स्त्री को अपनी पहचान
दिक्कत किस बात की अब ! हैं भगवन !!

सन्मान देना और सन्मान करने में अंतर
या मर्यादा की मूर्ति त्याग की देवी से परे
अगर वह सोचे कुछ अपने खातिर
क्यों जट पट कोई होता नहीं खुश उसके निर्णयों में ?!!

प्रेम का सागर वह खुद हैं जो चाहती
एक कोना छोटा सा हृदय में

अफ़सोस ! कुछ आचरण बदलते हैं
बस परिवर्तन नहीं आता विचारो में......


उर्मि

Hindi Poem by Urmi Chauhan : 111884718
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