माँ के दिन
इधर से आ उधर चले जाते हैं,
माँ निकट से दूर हो
निकट लगती है,
आशा से भरी
डबडबाई आँखों से,
मेरा चित्र ले
माँ संग दिखायी देती है,
हिमालय रंग बदल ले
नक्षत्र विकट हो जाएं,
धरा बदल जाय
माँ नहीं बदलती है।
प्यार की चुभन कम तो नहीं
फूलों के संग काँटे ही सही,
वह निकट-दूर ही सही
पर सदा जीवन का प्राण ही रही।
* महेश रौतेला