दर्द जो थे मेरे
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दर्द जो थे मेरे हिस्से के मेरे अपने मुझे लौटा गए,
फिर भी वे चाहते हैं कि उन्हें भूल जाएं हम।
साथ चलते हुए वे चुपचाप वापस हो लिए,
चाहते हैं कि और भी दूर लौट जाएं हम।
साथ बैठते हुये वह धीरे से दूर होने लगे,
आस लगाए वे कि धीरे से खिसक जाए हम।
लोग तो मरकर जल जाते हैं, दफा हो जाने के लिए,
किस पर क्या फर्क पड़ेगा, गर जीते जी जल जाएं हम।
किसने कब अपनी मौत देखी है, जीते जी,
वह क्या जाने, आंखों में उनकी रोज़ मर जाते हैं हम।
दुनियां पूजती है चन्दा और तारागणों को,
उन्हें भ्रम है कि जैसे उन्हें पूजते हैं हम।
कहते हैं तुम्हें कुछ नहीं आता सिवाय लिखने के,
नहीं जानते हैं कि कैसे एक शब्द लिखते हैं हम।
- शरोवन।