वो भी क्या दिन थे!
सांस रुकी है अब हर सांस से पहले,
वो भी क्या दिन थे जब बे-धड़क जिया करते थे!
अब तरसते है जिंदगी के एक प्याले को,
वो भी क्या दिन थे जब उनकी आंखों से पिया करते थे!
गुमनाम सा रहता है मेरे नाम का समंदर,
वो भी क्या दिन थे जब लहरों पे जिया करते थे!
ढूंढते फिर रहे हैं आशियाना शहर शहर,
वो भी क्या दिन थे जब उनकी बाहों में रहा करते थे!
बेख्याली में हाथ बढ़ाया किसी ने, तो याद आया..
वो भी क्या दिन थे कि होठो से छू लिया करते थे!
पूछते बहुत हैं वो, पर हमें ही जवाब न देना आया,
वो भी क्या दिन थे कि हम हक से गिला करते थे!
आज देख कर भी अनदेखा कर गए हैं हमें,
वो भी क्या दिन थे कि वो रास्ता रोक लिया करते थे!