बस,यों ही निकल जाऊँ
पहाड़ों की ओर
जैसे प्रवासी पक्षियां चल पड़ती हैं
अपने प्रवास पर।
सोचता हूँ
सरिता की कल-कल
वहीं सुनायी देगी,
द्रुत गति से बहता जल
वहीं दिखायी देगा,
ठंड का ठिठुरता यौवन
वहीं खेलाकूदा करेगा,
हवा का तीखा स्पर्श वहीं मिलेगा
मन की आसक्ति
ऊँचाइयों को घेरकर तृप्त हो जायेगी।
वहीं सुरीला संगीत स्वर्ग को सुनायी देगा,
युधिष्ठिर के आरोहण की तरह
बस,यों ही निकल जाऊँ
पहाड़ों की ओर।