मैं रिक्त हूँ
भरी हुई भी
मैं आह हूँ
और प्यास भी
मैं लहर हूँ
और उफ़ान भी
मैं मृत हूँ
जीने का सामान भी
मैं शोक हूँ
आनंद भी
गीत हूँ
गुज़रा छंद भी --
मैं प्रेम हूँ --जो सरल है
वह सहज भी और है तरल
मैं धरती भी आकाश भी
कुछ कड़ियाँ हैं
मधुमास की
मैं व्यथा हूँ
और चैन भी
मैं हूँ सवेरा
और रैन भी
मैं क्या हूँ और
क्या नहीं ?
मैं सृष्टि की हूँ अमर कथा
मैं आत्मा ,न कि देह हूँ
मैं सच कहूँ
तो विदेह हूँ -----
डॉ प्रणव भारती