प्रेम प्रणाम
*जिस प्रेम ने आपको सिर्फ दुख दिया हो, वो प्रेम हो ही नहीं सकता!*
प्रेम के नाम पर मन को खुशी होनी चाहिये नैराश्य नहीं!
*सच्चाई प्रेम की....*
एक रिश्ता बनाया था मैंने समर्पण से, विश्वास से, प्रेम से।
मैंने अपने जीवन में उस रिश्ते को हर एक रिश्ते पर प्रार्थमिकता दी। उस रिश्ते को हर क्षण अपने प्रेम से सींचा था, ऐसे में आज जब उस रिश्ते को बदरंग देखता हूं तो एक टीस सी उठती है मेरे दिल में। मेरा समर्पण मुझे धिक्कारता हुआ हँसता है मुझ पर।
तुम्हारा अपने वादों से मुकर जाना। मुझे एक ऐसी भीड़ में अकेला छोड़ गया, जहां मैं रोज अपने ही अंदर घुटता रहता हूं। मेरे आस-पास, मेरे ऐसे अपनों की भीड़ है जो सिर्फ मुझे हँसता हुआ देखना चाहता है।
आज मैं समझता हूं कि, मन की व्यथा कहने का साधन है मौन, जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।
*तुम्हें हमेशा शिकायत रहती थी, कि मैं बहुत बोलता हूं, काश तुम देख पातीं कि अब मैं हमेशा के लिए मौन हो गया हूँ।*
स्वार्थ पर आधारित संबंध भी कोई संबंध है..?
*ये संबंध नहीं सिर्फ.. बंधन कहे जा सकते हैं...।*