प्रेम माँगने से नही मिलता |
जो माँगने पर मिले वह प्रेम नही |
जहाँ प्रेम होता है वहाँ भावना समझाने
की आवश्यकता नही | जो समझाना पड़े
वहाँ प्रेम नही | प्रेम भीतर से होता है मगर
जब बाहर आता है तो बिखर जाता है |
प्रेम बाँधता नही स्वंय बँधकर आनन्दित होता है |
प्रेम खोनें और पाने का विषय नही |
प्रेम कभी मौके मे नही बँधता , जो बाँधा गया वहाँ
प्रेम था ही नही | प्रेम दो लोगों के बीच की वस्तु है
एक निर्बल दूसरा समर्थवान | परमात्मा के अतिरिक्त कोई
सर्मथवान नही इस सम्बन्ध को निभाने में |