जिस प्रकार प्रेम एकल व्यवस्था या जिम्मेदारी नही |
उसी प्रकार विश्वास किसी एक की जिम्मेदारी नही | विश्वास बनाना और होना दोनो एक साथ चलते है | इसी विश्वास पर माँ सीता ने वनवास अकेले काटा और भगवान श्रीराम ने विश्वास निभाया | माँ राधा ने भीतर से भगवान कृष्ण को जाना तो बाहर भला कौन तोड़ सकता था उन्हे | माँ पार्वती की तपशक्ति थे भगवान शिव | जिसने अन्तर से
जाना उसे बाहर कौन डिगा सकता है | अन्तर में अन्धेरा हो , जो जन्मान्ध हो उसे प्रकाश भला कैसे दिखेगा ? उससे विश्वास की अपेक्षा उसे निर्पराध सजा देने के समान ही है |