याद आऊंगा तुम्हे कभी
जब कभी हिज्र की रात होगी
जब कभी रमजान के बाद चाँद रात होगी
जब कभी गर्मीयों के बाद पहली बरसात होगी
जब कभी किसी बालकनी में आती हुई अजान की आवाज होगी
जब कभी खिड़कियों से आसमान में दिखती हुई चांदनी रात होगी
जब कभी दरवाजे पर मेरे ही जैसे कदमो की खटखटाहट होगी
जब कभी फजर के वक्त तुम्हारी नींद न तुम्हारे साथ होंगी
याद आऊंगा में बेशक़ तुम्हे उस क़यामत के रोज
जब खुदा के सामने हद से ज्यादा आशिक़ो को तादात होंगी.
anshu khan