कहो नगर की क्या खबर है
सर्वत्र राममय हुआ नगर है,
शिव-शंकर का हाथ नरम है
फूल-फूल से मिला गगन है।
लोगों का जो स्वार्थ प्रबल है
नर उसके आगे नतमस्तक है,
सुनो प्यार से दिन निकला है
उसका कातिल दूर खड़ा है।
पावस में जो घास खिली है
पतझड़ में वह सूख चुकी है,
डूबा दिन फिर निकल चुका है
प्रभु का मन में बास हुआ है।
सुफल योग की ये यात्रा है
पूजा सबकी बहुत नरम है,
देखो कृष्णमय हुआ मनुज है
उस अज्ञेय की खबर नहीं है।
* महेश रौतेला