इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः ।
आश्चर्यमोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका॥
इह अनुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः मोक्षकामस्य मोक्षात् एव विभीषि का ( भवति इति ) आश्चर्यम् ॥
ज्ञानी पुरुष को विषयों का वियोग होनेपर शोक नहीं करना चाहिये, जिस को इस लोक और परलोक के सुख से वैराग्य हो गया है और आत्मा नित्य है तथा जगत् अनित्य है, इस प्रकार जिस को ज्ञान हुआ है, और मोक्ष जो सच्चिदानंद की प्राप्ति तिस के विषें जिस की अत्यंत अभिलाषा है, वह पुरुष भी बलवान् देह आदि असत् स्त्रीपुत्रादि के वियोग से भयभीत होता है, यह बडे ही आश्चर्य की वार्ता है, स्वन में अनेक प्रकार के सुख देखनेपर भी जाग्रत् अवस्था में वह सुख नहीं रहते हैं तो उन सुखों का कोई पुरुष शोक नहीं करता है तिसी प्रकार स्त्री पुत्र धन आदि असत् वस्तु का वियोग होनेपर शोक करना योग्य नहीं है ॥
धीरस्तुज्यमानोऽपिपीड्यमानोऽपिसर्वदा।
अत्मानंकवलंपश्यन्नतुष्यतिनकु.प्यति ॥
धीरः तु ( लोकै विषयान ) भेज्यमानः अपि (निन्दादिना ) पीडयमानः अपि केवलम् आत्मानम् पश्यन् न. दुष्यात न वु.प्यति ॥
अब इस वार्ता का वर्णन करते हैं कि, ज्ञानी को शोक हर्ष नहीं करने चाहिये, ज्ञानी पुरुषों को जगत् के विषें पुण्यवान् पुरुष नाना प्रकार के भोग कराते हैं, परंतु वह ज्ञानी पुरुष तिस से हर्ष को नहीं प्राप्त होता है और पापी पुरुष पीडा देते हैं तो उस से शोक नहीं करता है क्योंकि वह ज्ञानी पुरुष जानता है कि, आत्मा सुखदुःखरहित है अर्थात् आत्मा को कदापि हर्ष शोक नहीं हो सकता है॥
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीवत् ।
संस्तवेचापिनिन्दायांकथंधुभ्येन्महाशयः॥