आज एक आग्रह बेटियों से नहीं बेटों से। बेटियों को हमने बहुत सिखाया। आत्मनिर्भर बनने के लिए भी और आत्म सुरक्षा के लिए भी। किन्तु यह भी सत्य है कि कई कदम भटक रहे हैं, ऐसे में
उसका साथ, उसकी एक शिकायत पर, चाहे वो सही है या गलत कानून दे रहा है। संघ संस्था उसके हक में खड़े हो रहे हैं। तुम्हारी कोई नहीं सुनेगा। क्योंकि गलत तुम भी कर रहे हों ।आधुनिकता सर चढ़ कर बोल रही है। अब तक एक सीमा रेखा समाज बेटियों के लिए तय करता आया है। किन्तु यह सीमा रेखा अब खण्डित हो चुकी है। जो बदलते परिवेश में स्वाभाविक है। क्योंकि बेटियों को घर की चाहरदीवारी में नहीं रख सकते। उन्हें भी वक़्त के साथ बढना है। हम अभिभावक छले जाते हैं अपनी ही संतानों से।
पर अब समझना बेटों को होगा कि जिसे तुम नए समाज का खुलापन समझ रहे हो, मौज मस्ती का साधन समझ रहे हो वो तुम्हारे लिए तुम्हारी बरबादी का कारण बन सकता है। किसी को घुमाने से पहले, होटल ले जाने से पहले सोचो कि कहीं तुम अपनी बरबादी का रास्ता तो नहीं तैयार कर रहे?
बलात्कार के नाम पर वो तस्वीर सामने आती है कि एक लड़की को जबरन उठा ले जाना,उसके साथ ज़बर्दस्ती सम्बंध बनाना पर आज जो हमारे सामने हो रहा है वह एक अलग ही तस्वीर सामने खड़ा कर रहा है।
पल शाह और संदीप लामिछाने बस एक उदाहरण है। उससे सीख ले सकते हो तो ले लो।
एक प्रश्न सामने आता है कि क्या वो पीड़िता काठमांडू में अकेली रहती थी?अगर हाँ तो एक बालिका को अकेले उसके अभिभावक ने कैसे रहने दिया?
अगर किसी रिश्तेदार के यहां रहती थी तो सारी रात उसके बाहर रहने पर किसी ने खोज खबर क्यों नहीं ली?
अगर हास्टल में थी तो वहाँ भी रजिस्टर मेंटेन होता है , तो अगर वो रात को नहीं लौटी तो हास्टल मेनेजमेंट ने कोई खबर क्यों नहीं ली?क्यों नहीं पुलिस रिपोर्ट कराया?
होटलों में भी बिना परिचय पत्र के किसी के भी साथ कमरा शेयर नहीं करने दिया जाता ।फिर उसे कैसे इजाजत मिल गई?
कई ज्वलंत सवाल हैं जिस पर खुल कर बहस होनी चाहिए क्योंकि हम सब माता पिता हैं ।बदलते समाज की यह पारिस्थिति परेशान तो कर ही रही है।