प्रेम बिना भक्ति संभव ही नही ,
जहाँ प्रेम होता है , वहाँ दया के
लिए कोई स्थान नही |
प्रेम के स्थान पर दया पात्र के
लिए मृत्युतुल्य है |
प्रेम स्वाभिमान की पहली सीढ़ी,
समर्पण की पराकाष्ठा है |
प्रेम की जड़े अन्तर हृदय है ,
चाहना और न चाहना का कोई
स्थान नही , प्रेम विकल्प नही |
प्रेम अन्तरप्रकट स्वभाव है |