हर बार शब्द अधूरे ही रहे,
अन्तर की बात अन्तर मे ही दबी रही ,
मै कभी कह न सकी तुम सुन न सके ,
ये जो रह- रह कर हृदय को चीर मानो ,
बाहर निकल जाना चाहती है इस पिंजरे से ,
जाने क्या रोग लगा जिसका दिखता इलाज नही |
यह कैसी घुटन है जीवन की , जीवन की दिखती
किरण नही बस रह रह कर अन्दर ही अन्दर गला
रही है मुझे |
अन्तस