हे कृष्ण
तुम्हारी बातें मेरे भीतर हैं
जो तुमने उनसे कही थीं
या अर्जुन को बतायी थीं,
सब मैं इकट्ठा न कर सकूँ
पर कुछ देख सकता हूँ,
मैं महाभारत न लड़ सकूँ
पर मन का युद्ध तो लड़ सकता हूँ,
रणछोड़ तुम भी थे, मैं भी हूँ
यह प्रकृति भी है,
पर युद्धों का अन्त नहीं,
मनुष्य के साथ-साथ युद्ध जन्मता है।
वैभव मे जो आता है
युद्धों में नष्ट होता है।
* महेश रौतेला
३०.०५.२०१८