विश्वास और अविश्वास से परे हो तुम ! ,
स्वीकृति ,अस्वीकृति से परे तुम ! ,
मुझमे तुम्हारी स्थिति मुझसे परे है |
स्वीकॎर,अस्वीकार से परे हो तुम !,
तुम क्या हो नही जानती मै मगर !
मुझमे तुम्हारी उपस्थिति झुठला नही
सकती | हृदय की पीड़ा हो , शायद !
आभाव भी | यह जानकर भी मुझमे
बैठा अस्वीकार्य भी |
तुम प्राण हो फिर भी जीवन की तरफ
मेरा मुँख क्यों नही़ , मृत्यु से भी तो प्रीत नही ,
भीतर बाहर सब अशान्त सा |
शान्ति का कोई गीत नही ,
चीख रहा हो घुटन लिए ,
पीडा का कोई अंत नही |