दोस्तो फिर कभी पहाड़ जाओ
तो मुझे याद कर लेना,
पहाड़ियों के बीच
अभी तक अटका हूँ,
वृक्षों की छाया में
अब तक खड़ा हूँ,
ठंड़ी हवाओं में
अभी तक उड़ रहा हूँ।
जो सौन्दर्य आकाश को छू
अक्षुण्ण रहता है
मैं उसमें मिला हूँ।
प्यार जो किया
प्यार जो करूँगा
सब रख जाऊँगा
पहाड़ियों के सान्निध्य में।
आहट धरती की
बना रहूँगा
नदियों से शुभ्र शब्दों को
पकड़े रहूँगा।
जो रास्ते आपस में जुड़े हैं
वहाँ कुछ देर ठहरकर
गुनगुना लेना
जैसा हमने गाया
वैसा ही फिर एकबार गा लेना,
जीने की कला को
बार-बार दुहरा लेना।
बादलों की घनघोर आवाज के बीच
बिजली सी चमक रख
क्षणभर ही सही,
बारिस में भीग लेना।
हमारी आदतें
प्यार करने की छूटें नहीं,
हमारा संघर्ष
बुराई हटाने का टूटे नहीं,
हम निस्तेज न रहें
क्षितिज के परे भी खड़े रहें,
हम जो लेते हैं
उसे लौटाने का सामर्थ्य रखें,
पृथ्वी की सुगन्ध को
अजर -अमर रहने दें।
हल्की सी महक
जो मुझमें समायी हुयी है,
उसे गाँठ बाँध लेना,
दोस्तो पहाड़ों को
मेरी ओर से सशक्त प्रणाम कर देना।
* महेश रौतेला