अमृत महोत्सव मनाऊँगा
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मैं भी अपने घर की मुंडेर पर
तिरंगा फहराना चाहता हूँ,
आजादी के अमृत महोत्सव में
अपनी भागीदारी निभाना चाहता हूँ।
पर हाय रे मेरी किस्मत
तूझे दोष देकर भी क्या करुँ?
मैं किस्मत को दोष देकर भी
बेघर हूँ आज तक तो
क्या आज घर वाला हो पाऊँगा?
घर की बात तो बहुत बड़ी बात है
आज तो झोपड़ी का मालिक भी
बन सकूँगा ये सपने जैसा है।
कोई बात नहीं आज ये मौका नहीं है,
शासन सत्ता पर ऊंगलियां उठाने का
कुछ आज भाव ऐसा मेरा नहीं है।
आजादी के अमृत महोत्सव का
उल्लास अपना फीका करने का
कतई ये इरादा मेरा नहीं है,
आज नाचने, गाने, झूमने का
बस! परिवार संग इरादा मेरा है।
घर या झोपड़ी की शिकायत
फिर कभी कर लूँगा यार
अपनी भारत माता की खुशियों को
फीका करने का इरादा मेरा नहीं है।
आजादी का ये अमृत महोत्सव
फिर तो नहीं आयेगा कभी,
आजादी के सौ साल का जश्न
शायद ही मैं मना पाऊँगा।
इसलिए मैं आजादी के पचहत्तर साल के
अमृत महोत्सव के साथ ही
आजादी के सौ साल का जश्न भी
इस बार ही मना कर खुश हो लूँगा।
घर या झोपड़ी ही तो नहीं है अपना
इस बात पर न आज दु:खी होऊँगा।
अपने घर पर तिंरगा फहराने का जश्न
मैं तो आज जरूर मनाउँगा,
घर पर तिरंगा भले नहीं फहरा सकता
पर अपने तिंरगे का मान
हर घर तिरंगा अभियान का
हिस्सा तो जरुर बनूंगा,
बड़े गर्व से तिरंगा अपने सिर पर
फहराकर जरूर पूरा करुँगा,
आजादी के अमृत महोत्सव का
हिस्सा तो मैं बनकर ही रहूँगा।
अपनी पूरी ताकत से जयहिंद और
भारत माता की जय का उद्घोष करुँगा
जय हिंद जय भारत का मैं भी
खुशी खुशी जयघोष करुँगा
वंदेमातरम खुशी खुशी गाऊँगा,
मैं आप सबकी तरह ही
आजादी का अमृत महोत्सव मनाऊँगा।
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.
8115285921
©मौलिक, स्वरचित