एक दिन तुम रहोगे तब भी ,
जब मै न होंऊँगी ,
देह साँसो से पृथक होगी मगर फिर भी !
प्राण होगा देह से पृथक कहीं |
यह जानती हूँ मैं! क्योंकि ऐसा
मानती हूँ मै ! |
उस दिन तुम क्या करोगे?
यह सोचती हूँ मैं ! शायद तुम नही |
फर्क पड़ता है मेरे होने या न होने से तुम्हे
टटोललती हूँ अब भी किसी कोने में ,
यह मैं ही हूँ शायद ! तुममें आरोपित
तुममे भी शामिल हूँ मै!
यह पता नही |
उसदिन किसे दिखाओगे ,
तश्वीर अपनी रंगों से भरी ,
मन को आनन्दित करने वाली,
मेरी बेरंग आँखो के अतिरिक्त |
सोचती हूँ मै तुम्हे ! सोचती हूँ !!
सोचते शायद तुम नही |