बचपन मे जो सहज था यूँ ही प्रश्न आज
मन ने फिर दोहराया है ,
कौन हूँ मै ?
आखिर कौन ?
लेकिन निरुत्तर ही पाया |
कौन है जो बोलता है ?
कौन है जो समझता है ?
आँख के भीतर से आखिर
कौन देखता है |
सोचती हूँ तो लगता है
सोचा न था ,
प्रश्न इतना बड़ा है |
कौन है ?
पूँछती हूँ !
पूँछता भी आखिर कौन ?
क्रमशः..