बैठे हो अन्तर में तो बाहर क्यों भटका रहे हो,
जो भूली हूँ खुद को क्यों नही बता रहे हो ?
झूठी आकांक्षा का पर्दा डाले रोज एक नई
कहानी सुना रहे हो | आखिर मुझे कहाँ ले जा रहे हो ?
मै कौन हूँ ? तुम कौन हो ? क्यो नही बता रहे हो |
अपनी गति मे क्या मुझे पा रहे हो?
अविनाशी, अविकारी, आकारहीन हो तुम मगर होगा आकार फिर भी तो तुम्हारा | हमने तो अपनी क्षमता ,
भाव दृष्टि की से तुम्हे अविकारी , आकारहीन माना है मगर ! तुम्हारी स्थिति मे तो तुम्हारा आकार होगा ?
चलो मुझे इतना ही बता दो किस आकार स्थिति में मेरी
स्थिति निर्धारित की है ? किस रूप मे तुमने मुझे मिलना तय किया है ? अथवा क्या स्वरुप है मेरा ? कौन है जो भयभीत है तुमसे दूर जाने से? कौन है जो तुम्हे जानना चाहता है? कौन है जो प्रश्न पूछ रहा है |