दोस्त !
नहीं होते
एक दिन के लिए
न कुछ समय के लिए
दोस्त !
नहीं रखते
अपेक्षा या फिर उपेक्षा
दोस्त !
समझ लेते हैं
आँखों से अनकहा भी
समेट लेते हैं
अपने मन में
वो सभी रिसते घाव जो ,
न जाने कब से
बहते रहते हैं
आँखों के रास्ते
गालों पर
दोस्त !
बस जाते हैं
गहराई में
निकाल लाते हैं सारी पीड़ा
जो समय के गर्भ में
न जाने
कितने लम्बे समय से
पिघलती रहती है
मोमबत्ती की भाँति
दोस्त !
चिपके रहते हैं
दिल की ज़मीन पर
बिन कुछ कहे
बिन कुछ सुने
वे दोस्त हैं
जो हर पल
मेरे भीतर
करते रहते हैं
चहलकदमी !!
मेरे पास नहीं है
उनके लिए
कोई परिभाषा !!
वो ---बस दोस्त हैं
बिन अपेक्षा
बिन उपेक्षा -----!!
डॉ. प्रणव भारती