*कलगी, अंकुर, पत्ती, शाखा, फल*
1 कलगी
स्वर्ण मुकुट कलगी सजी, मोर पंख घनश्याम।
अधर-मगन वंशी बजे, झूम उठे बलराम ।।
2 अंकुर
विकसे अंकुर धरा से, खुशियों की बरसात।
हरियाली घोड़े चढ़ी, अनुपम दी सौगात।।
3 पत्ती
हरी-भरी पत्ती झरीं, वृक्ष हो गए रूख।
हरियाली दिखती नहीं, वन उपवन सब सूख।।
4 शाखा
वृक्षों से शाखा विलग, मारुति-वेग-प्रकोप।
तूफानों में घिर गई, सुंदर सृष्टि विलोप।।
5 फल
सेवा भावी वृक्ष सब, फल देते निस्वार्थ।
सदियों से वे कह रहे, वन-उपवन हे पार्थ!।।
मनोजकुमार शुक्ल " मनोज "