!! त्रिदेवों में देवाधिदेव भगवान शिव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर वे कल्याण के प्रदाता हैं तो दूसरी ओर प्रलयंकार भी हैं।वे दिगम्बर होते हुए भी सबको ऐश्वर्य प्रदान करने वाले त्रैलोक्याधिपति होकर भी श्मसान में निवास करने वाले, अनन्त विभूतियों के स्वामी होने पर भी भस्म रमाने वाले, योगिराजधिराज होकर भी अर्धनारीश्वर तथा कान्तासेवित होते हुए भी कामजित है। भगवान शिव आशुतोष एवं अवघढ़दानी हैं। वे क्षमाशील तथा अशरणों को शरण देने वाले, सबके मूल कारण, पालक, रक्षक एवं नियन्ता हैं अत: ईश्वर के भी ईश्वर *महामहेश्वर* कहे जाते हैं।भगवान भोलेनाथ को रुद्र भी कहा जाता है क्योंकि- *रुतम्- दुःखम् द्रावयति- नाशयतीतिरुद्रः* यानि की भोले सभी दुःखों को नष्ट कर देते हैं।रुद्राभिषेक से हमारे जीवन पटल से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।शिव के बारे में *रुद्रह्रदयोपनिषद* में कहा गया है कि *सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वेदेवाः शिवात्मकाः* अर्थात सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा ही है।इसलिए कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वतः ही हो जाती है !! ब्रजेन्द्र नाथ त्रिपाठी !!