Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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द्रौपदी:तब और अब
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एक थी वह द्रौपदी
जो गुहार लगाती, दुहाई देती रही
धर्म, मर्यादा और रिश्तों की।
राज सभा में अपने भी बहरे थे
फिर असहाय और शर्मिंदा हो
टेर लगा दी अपने कन्हैया को
विवश हो कर
अपनी रक्षा की खतिर।
लीलाधर ने लीला ऐसी रची
कि रिश्तों की ही नहीं
नारी मर्यादा की आखिर
उस समय लाज बच गई।

मगर आज की द्रौपदी
किसी और मिट्टी की बनी है,
हौसले की मीनार है,
न टूटी, न बिखरी, न हारी
याचना, लोभ, भीख से परे
बढ़ चली संघर्ष का पथ वरे
लालच भाव से विनिर्मुक्त
निर्विकार भाव से समर्पित
अपने कर्मपथ पर।
अविराम चलती हुई
धरती से शिखर तक
सबसे पीछे खड़ी होकर भी
आज देखिये सबसे आगे पहुँच गई।
समय की यही गति है कि
वह द्रौपदी महाभारत की सूत्रधार थी
तो यह द्रौपदी भारत का मान बन गई।
चुपचाप ही आगे बढ़ती रही
बिना किसी आकांक्षा के।
आज खुद भारत की राष्ट्रपति ही नहीं
प्रथम नागरिक भी बन गई,
द्रौपदी गौरवान्वित हुई या नहीं
ये तो खुद द्रौपदी ही जाने
मगर भारतभूमि जरूर जागृति हो गई
द्रौपदी को पाकर उसकी बाछें खिल गईं,क्योंकि-
आज शीर्ष पर पहुँच गई
अंदर से लौह इच्छा शक्ति वाली बेटी
समूचे भारत को विश्व पटल पर ला
नई पहचान के साथ छा गई।

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.
8115285921
©मौलिक, स्वरचित

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