जीव के अंदर निवास कर रही आत्मा जो की जीव का यथार्थ और वास्तविक स्वरूप है वो कदापि नही चाहती है की जीव दुख और तकलीफ भोगे और चाहेगी भी क्यूं भाई
परंतु जीव ने तो अपना सुख स्वय निर्मित किया जिसे कित्रिम सुख कह सकते वो सुख का कारण सदैव, संसार और संसार की विषय वस्तुओं पे निर्भर रहती है, है ना ?
वो सुख कदापि सुख नही हो सकती जो किसी विषय, व्यक्ति, वस्तु के कारण से जुड़ी हो वास्तविक सुख तो अकारण हृदय में प्रवेश करता हैं और यही वो सुख है जो शाश्वत है ,सुंदर हैं और क्योंकि वहीं शाश्वत सुख और आनंद तो उसका वास्तविक स्वरूप है और जिसका जो स्वरूप है अगर उसे ही प्राप्त कर लो तो सुख हेतु ना तो तुम्हे कारण की अवयशक्त पड़ेगी और न ही वो सुख किसी पे निर्भर अथवा किसी से जुड़ी होती है जो रूपांतरित हो जाए नही कदापि नहीं
ना तो तुमने सुख की परिभाषा जाना, ना सुख का स्वरूप जाना , ना तो सुख का अर्थ जाना और न ही सुख शांति का अनुभव किया बस तुमने तो केवल उस सुख को जाना जिसे संसार और सांसारिक विषय भोग वस्तु तत्व की माया है और हर व्यक्ति अलग अलग भौतिक तत्व में इस सुख की तलाश करते है और हर व्यक्ति के लिए सुख की परिभाषा कभी एक नही होती किसी किसी का सुख तो किसी के दुख से जुड़ा होता है
नोट वो सुख कदापि सुख नही हो सकती जो बाहा अथवा भौतिक कारण से जुड़ा बंधा हो इस प्रकार तो ये सुख उस अमुक तत्व, भोग, विषय, व्यक्ति अथवा वस्तु के ऊपर निर्भर करती है तो ये चिरस्थाई कैसे हो सकता है और जो सुख अकारण हो स्वय अपने होने का कारण हो केवल वही चिरस्थाई सुख और वास्तविक आनंद है