“जैसे बरसी हैं आँखें मेरी साँवरे,
टूट कर ऐसे सावन भी बरसा नहीं।
स्वाति की बूँद को जैसे तरसी हूँ मैं
कोई चातक कभी ऐसे तरसा नहीं।।
साँस टूटी नहीं ,आस छूटी नहीं,
प्यास मरुथल में पानी दिखाती रही।
साँस आती रही ,साँस जाती रही,
मैं तुझे गीत में गुनगुनाती रही।।”