जीवन के मेले मुबारक !
खुशियों के रेले मुबारक !
अब इससे ज्यादा क्या दूँ
दुआँ दूँ तुम्हे ओढ़ कर कबर तक
ले जाऊँ बचे हिस्से मे जो गम हो तुम्हारे |
विश्वास की तुम बात न करना मैने विचारा नही,
विचारा तो तुम्हारे हिस्से कुछ न होगा , बुद्धि को दे
मात मुबारक |
शिकायत तुम्हारी तमाम होती है ,
जब भावना देह के पार सोचती है |
तुम्हारा सत तुम जानो , मेरा सत यहीं से है |
संशय तुम्ही! विश्वास तुम ! दोनो के बीच से निकलती आस तुम | खुलती नही आँखे नींद भी तुम्हारी है , हो अंधेरा और उजाला संशय भी तुम , तुम ही आरी हो |