जब सपना टूटता है प्यार का
धड़ाम से
जब सपना कटता है प्यार का
कड़ाक से,
जब सपना गिरता है प्यार का
धड़ाम से
जब सपना घिसता है प्यार का
धीरे-धीरे,धीरे
घर खाने को आता है शनैः-शनैः, शनैः।
भोर जब सन्नाटा लाता है
प्यार में आती है खटास,
रास्ते टूटते हैं जहाँ-तहाँ से
जैसे बाघ खा जाता है बकरी को
प्यार का नहीं दिखता नामोनिशान।
* महेश रौतेला