कभी बात होंठों तक आकर रुक जाती है
कभी कलम कुछ लिखते हुए रुक जाती है
कभी रात सारी यूं हीं आंखों में गुज़र जाती है
कभी हाथों की लकीरें मुझे देख मुस्कुराती हैं
जाने क्या है जो हर वक्त मुझे सालता रहता है
कौन सा गम है जो कभी कम ही नहीं होता है
सवाल बहुत हैं जिनके जवाब मिलते ही नहीं
जाने किस उधेड़बुन में जिंदगी गुजरती जाती है
-अनुभूति अनिता पाठक