मनाती जो वजह समझ पाती ,
समझ भी तुम्हे सौप दी थी |
है मजबूत कंधे तुम्हारे तुम
मुझे गिरने न दोगे |
मेरी निश्चिंतता का कारण
तुममे विश्वास ही तो था |
जिसे बार -बार धूसरित
समझते रहे तुम !
शिकायत भावना को भी
थी मगर ! मन मे ख्याल न
आया जीवन दिखा तुममे ही
केवल ! कोई और सवाल न आया |
संकल्प सिद्ध नही होते मेरे मगर!
तुममे तो दृढ़ रही |
खोज लो भीतर चाहो तो !
तुमसे अलग कभी न रही |
हर जगह तुम दिखते हो ,
तुमसे ही बाते करती हूँ |
कभी लड़ती कभी भिड़ती
कभी शिकायत करती थी |
तुम्हे कोई भी स्थिति मुझसे
निकाल नही सकती |
दर्द की अन्तिम सीमा के आगे भी
तुम्ही रहोगे |
नही पता किस रुप मे शायद!
शिकायत बनकर ही |
तुम्हे घड़े मे देख तुमसे प्रेम हुआ |
भूल गई आकाश मे देखना ,
विवेकशून्यता समझाती रही ,
घड़े आकाश मे फर्क बताती रही |
न घड़े मे स्थिर हो पाई न आकाश
की तरफ देखने की इच्छा हुई |
मन अशान्त विचलित घूमता रहा ,
क्या अभिलाषा है आवश्यकताओं
को न जान सकी |
घूम रही हूँ अब उसी परिधि मे ,
उदास नेत्र ,भरा हृदय ,
अभावयुक्त मन लिए |
अंतस