साथी,
कभी तुम मेरे संग मेरे गांव चलना,
वहां तुम्हे दिखाएंगे क्यों हमें मोहब्बत है अपने गांव से,
वहां की शाम ना बहुत हसीन है,
सड़कों पर बच्चों का शोर,
गली गली में चाट पकोड़ो की दुकान,
और उनसे आती एक अलग ही खुशबू,
खेत से आते मजदूर,
और मिट्टी की वो सौंधी से सुगंध,
और पता है सबसे बेहतरीन क्या है,
बुजुर्गों का जमावड़ा,
उनकी पंचायत,
जहां आज भी गांव से लेकर देश तक की बातें होती है,
और दोस्त,
मेरे गांव की सुबह,
उसकी तो बात ही अलग है,
ठंडी ठंडी ताजी हवा,
सड़कों पर दौड़ता आंखों में सपने लिए युवा,
और मंदिरों की घंटी की आवाज,
और और,
वो सुबह सुबह के वक्त चौपाल,
सच सब कुछ अभी भी बहुत सुंदर है,
पता है दोस्त,
मेरे गांव की मिट्टी में,
अभी भी अपनेपन की एक महक बाकी है,
एक सुकून की सुबह और शाम बाकी है,
बहुत कुछ बदल गया मेरे दोस्त,
पर अभी भी मेरे गांव में,
इक समाज बाकी है.....