अपरिचित (कविता )
अपनो के बीच सपना हूँ,
थी कल शायद !
कहाँ आज हूँ |
हूँ किस्सा ही तो !
कल्पना का हिस्सा ही तो !
हकीकत ने हिलाकर झकझोरा
बहुत मगर!
नींद की मूर्छा जाने क्यो न गई |
चल पड़ी नींद मे ही इंतजार लिए
जो कुछ दूर आगे बढ़ी ,
देखी तो दूर तक न थी अपनी जमीं |
न जाने कहाँ खड़ी थी मै !
अंजान चेहरो के बीच ,
अपना चेहरा देखकर मन ठिठक गया |
हृदय पुलकित मन आनन्द की सीमा
लांघने लगा |
कि तभी सामने एक और चेहरा दिखा ,
जिसने परिचित को अपरित कर दिया |
मगर ! फिर भी !!
तलाशती रही , चोरी से ,
यहाँ वहाँ निहारती रही |
बचे थे शब्दों के कुछ टुकड़े उन्हे
उठाकर गले लगाया |
किया स्वागत नेत्रों ने जल
बरसाया |
जैसे ही मेघ शान्त हुआ ,
पुनः हृदय क्लान्त हुआ ,
यह क्या यह भी मेरा नही ,
इसपर भी अब शायद !
मेरा अधिकार नही |