पहाड़:
पहाड़ झुकते नहीं
आकाश की ओर झांकते,
आस्था के पुंज से
विशाल से और विशाल होते।
पहाड़ हमारे हैं
हमसे बड़े, हमसे उदार
झरने बनाते हुये
कल-कल की आवाज में ढले।
बहुत जिद है इनमें
शान्त-शीतल रहने की,
रास्तों को मोड़ कर
जीवन को सरल करने की।
हाथ आयेगा पहाड़
उगते सूरज के साथ,
टिमटिमाते नक्षत्रों के बीच
बुरुश के फूल की तरह खिलता।
* महेश रौतेला