*धरती,गगन,पाताल,त्रिलोक,त्रिभुवन*
1 धरती
धरती कहती गगन से, कितना है विस्तार।
तेरा तो कुछ है नहीं, बस सूना संसार।।
2 गगन
मेघ गगन में छा रहे, सबको लगी है आस।
जेठ गया आषाढ़ अब, सुखद हुआ आभास।।
3 पाताल
सूख गया पाताल अब, रोता कृषक निराश।
इन्द्र देव वर्षा करें, प्रकृति का न हो नाश।।
4 त्रिलोक
गूँजी सभी त्रिलोक में, प्रभु की जय जयकार।
खुशहाली की धूम है, लीला अपरंपार।।
5 त्रिभुवन
शिवशंकर त्रिभुवन बसे, काशी शिव का धाम।
सोमवार का शुभ दिवस, है भोले का नाम।।
मनोजकुमार शुक्ल " मनोज "