मेरी कौन सुने
मन की कौन सुने
मन को स्वयं से कहा फुरसत
वो तो बस मौन सुने।
मन मानी मन की मानी
डूब गया मैं गहरे पानी
था बहुत दूर तक वो फैला
कुछ अच्छा तो कुछ था मैला।
मन तरंग की उधड़ी चादर अब तो कौन बुने।
मन की कौन सुने।
सुना जो मन की
ऋषि व्यास ने सागर जैसी गाथा लिख डाली।
वही सुना जो नरका सुर ने।
लक्ष सहश्रम नारी कब्जा ली।
था मन एक एक थी गति भी।
लेकिन एक न चले।
मन की कौन सुने।
रामायण और महाकाव्य
जैसे जो ग्रंथ बने।
इनके अंदर वर्णित जीवन मन से ही ऊपजे।
क्यों सीता वन वन में भटकी।
क्यों रोई द्रुपद्सुते।
क्यों ध्रुव जी जंगल को जाते
और क्यों ईश्वर मिलते
मन की कौन सुने।
मनुज एक मन दो भीतर है।
स्वयं से द्वंद करे।
मन की कौन सुने।
मन कहता है स्वयं को
उल्टा
नम होकर ही चले।
मन की ..........
आनंद त्रिपाठी
लेखक।