“जो केवल तकते हैं, तकते ही रहते हैं।
कायरता के प्रतीक, सोच लिए जाते हैं।।
यूँ तो कहलाते हैं, जंगल के पुरोधा किंतु।
गीदड़ों के झुंड में, दबोच लिए जाते हैं।।
सामने दरिंदे हो, तो लड़ना ही पड़ता है।
आंखों के आंसू भी, पोछ लिए जाते हैं।।
जिस उपवन में, यदि होते नहीं शूल।
उसके समूचे फूल, नोच लिए जाते हैं।।”