“कभी-कभी लगता है अपने हिस्से जिम्मेदारियां ही आई,
घर पर थे तो घर की जिम्मेदारियां, बेरोजगार थे तो नौकरी की जिम्मेदारी।
अब नौकरी में हैं जो घर चलाने की जिम्मेदारी, अपने हिस्से प्यार, मोहब्बत, इश्क़, आशिकी ये शायद नहीं आ पाई क्योंकि सच तो ये है साहब वक्त पर इन चीजों को हम वक्त नहीं दे पाए।
पर मुझे लगता है कि अच्छा जिम्मेदार होना दरअसल जिम्मेदार लोगों के लिए उनका परिवार ही उनका इश्क होता है।।” – © जतिन त्यागी