सर्वार्थसंभवो देहो जनित: पोषितो यत:,
न तयोर्याति निर्वेशं पित्रोर्मत्र्य: शतायुषा।
*भावार्थ - सौ वर्ष की आयु प्राप्त करके भी माता-पिता के ऋण से उऋण नही हुआ जा सकता। वास्तव में जो शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का प्रमुख साधन है, उसका निर्माण तथा पालन-पोषण जिनके द्वारा हुआ है, उनके ऋण से मुक्त होना कठिन ही नही, सर्वथा असम्भव है।*