अब सोचती हूँ !
तुममे जो है वो मेरे अन्तर का,
आभाव ही होगा शायद !
जिसे पालकर रखा है मैने जो,
नासूर की तरह रिस रहा है |
टपकती है बूँदे जिसमे आँसू बनकर,
जिसे देखकर तुम्हारा हृदय पसीजता होगा,
हाँ! वो प्रेम नही होगा शायद !
होगा स्वभाव दया का ||
जिससे तू अनुकूलता दर्शाता होगा ,
यह आवश्यक नही होगा मेरे लिये तभी तो ?
मुझे बाहर निकाल रहा है ,
जिसे मै मोती मान बैठी थी उस भावना को,
धागे से उतार रहा है , जो बंधन प्यारा उससे
स्वतंत्रता देकर छोड़ दिया मुझे आजाद एक शब्द मे कहकर ||
वही कबसे ही वेदना लपेटे खड़ी हूँ विवेकहीन ,
हाँ ! उसे भी तो तुम्हे ही सौंप आई थी |
मै जहाँ खड़ी हूँ चौराहा है जहाँ अनेक रास्ते मंजिल छुपाये खड़े हैं ,
मगर! मै खड़ी हूँ वही इच्छाहीन , हाँ वह भी तो तुम्हारे पास ही छोड़ आई हूँ ||
न जाने कहाँ से छुप -छुपाकर एक उम्मीद
मेरे साथ चली आई ,
जिसका हाथ पकड़ खड़ी हूँ कि आओगे तुम वापस एक दिन , अपने साथ मेरी इच्छा मेरा विवेक लेकर | हाँ यह तुम पर छोड़ती हूँ कि तुम मुझे क्या वापस करोगे , मेरी इच्छा या मेरा विवेक , हाँ सबकुछ तो तुम्हे सौंपा था ! उपहार स्वरुप , खुद को भी ! जिसे तुमसे अपनाया न गया | हाँ ! शिकायत नही करूँगी तुम्हारे लौटकर ,लौटाने पर ||
हाँ ! समाहित हो जाऊँगी आशा और निराशा , अनुरक्ति और विरक्ति के बीच की धरा पर बस ! हो सके तो एक बार तुम अपने पांव रख देना उसी धरा पर ताकि फिर कभी न आ सकूँ नाहक बाहर |
23/4/2022