ले चल मुझे किसी मार्ग से ,
पहुँचा दे मुझे मेरे गाँव |
चिरनिद्रा मे सोई हूँ,
जलते,बुझते दीपक की तरह,
कई ख्वाब लिए सोई हूँ ||
प्रेम न जानूँ ,पंथ न जानूँ,
अज्ञानी मैं ग्रन्थ न जानूँ ||
कर्म की लौ भी बुझी हुई सी,
भक्ति की शाखा ढूँढ रही ,
मन चपल ,चलंता ,
कुरूप नियंता पल पल ,
बदले ये मार्ग कई,
आखिर "मै" हूँ क्या ?
मुझमे "मै" हूँ क्या ?
मेरा "मै" है क्या ?
कितने प्रश्नों से जूझ रही|
जीवन मे रस न,
क्या होती रसना?
कैसे यह प्रश्न मै पूँछ रही ||
नाव न बदली , बदली बदली ,
न मिला किनारा , डूबूँगी या ,
मझधार बची |
तुम ही यह जानो ,
मुझको पहचानो ,
यह प्राण तुम्ही मे रही बसी ||
17/4/2022 अंतस