ज़िंदगी
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ज़िंदगी प्यार की मानिंद थपथपाती है
ज़िंदगी रेत की मानिंद भुरभुराती है
ज़िंदगी आज है क्या बात न पूछो कल की
ज़िंदगी आग की मानिंद झुलस जाती है ----
ज़िंदगी मौत है और मौत है रहबर तेरी
ज़िंदगी बीतती जाती है ,याद आती है
ज़िंदगी फूल सी महके कभी नश्तर सी चुभे
ज़िंदगी बाग है ,वो दूर से लहराती है -----
ज़िंदगी आग का दरिया है और पानी भी
ज़िंदगी फूल सी नाज़ुक खिली जवानी भी
ज़िंदगी क्या है और क्या नहीं ख़बर किसको
ज़िंदगी मौत तो है ही ,गले लगाती है ||
प्रणव भारती