सोचती हूँ क्या तुम्हे अब भी याद हूँ ,
यह मानकर कि कभी याद थी |
हाँ ! जानती हूँ तुम्हे फुर्सत नही ,
अपनो के बीच याद करने की |
फिर भी जाने क्यों झूठी तसल्लियाँ देती हूँ,
तुम्हारे शब्दो , शिकायत मे अपनी परछाईं देख लेती हूँ|
कुछ क्षण के लिए सूखती भावना पर छींटे पड़ जाती हैं |
लेकिन तभी अचानक याद आती है ,
अस्पष्ट हिदायते अनुरोध के वस्त्रो से ढकी हुई |
पुनः पलटकर खुद की तरफ नजर जाती है ,
नही ! नही ! तुम गलत नही !! |
मै तेरा मूल्य हूँ ही नही |रचना 28 Mar 2022
मूल्यांकन