क्या हुआ हमपे....क्यु किया हमने ,
पता है ? , बगैर आत्मा जीना क्या हे ? ।।
झर्रे-झर्रे मे लल्ला की रहनुमाई बहती है ।
आपकी किताबो के पन्नो मे , खो गई है ।।
लकीरो मे सिमटा जमीन का टुकड़ा हु ? ।
या आपकी कूटनीति का आयना हु ।।
आपकी पघडी नही सर हु , मे कश्मीर हु।
ज्ञान , विज्ञान और तकनीक की धरोहर हु।।
कश्यप,शंकर,वाग्भट्ट और कालिदास जैसे...
कई को की छैनी-हथोडी से तराशा गया हु ।।
न किताब मे , न जहन मे और न ही अखबार मे ...
जानने को मुझे.. खुद गुजरो मेरे हालात से ।।
Dedicated to kashmiri pandits and Kashmir.