स्त्री
डेढ अक्षर का ये शब्द
कितनी जिम्मेदारियो को पिरोता है।
एक नन्ही सी लडकी
जिसे गर्भ मे ही मारा जाता है।।
उसके एहसासो को समेटा जाता है
तू लडकी है दूसरे घर तुझे जाना है।
ये याद दिलाया जाता है
उसको बतलाया जाता है।।
तू ढंग से रह
कोई कुछ बोले गर रस्ते मे उसे।
वो नीचे गर्दन कर
वहाँ से निकल जाती है।।
मन मे कुण्ठा को पाले
वो मन ही मन घूट जाती है।
पहले माँ-बाबा की खुशी की खातिर
शादी करके जाती है।
लाख ताने सहे परन्तु
उनको नही बताती है।।
झूठी मुस्कान के पीछे
वो लाखो दुख छुपाती है।
अब पति की खुशियो की खातिर
वो अपने ख्वाब दबाती है।।
फिर भी कोई मान नही
उसका कोई सम्मान नही।
वो गंगाजल सी पावन है
वो कष्टो को भूल जाती है।।
डेढ अक्षर का ये शब्द
कितनी जिम्मेदारियो को पिरोता है।।
मीरा सिंह