शीर्षक: अस्तित्व बोध
जीवन के कई पन्ने आज भी अधूरे है
कहीं गम कहीं आँसूं बिखरे, पसरे है
क्या बताऊँ दास्ताँ सब उलझनी चेहरे है
रिश्ते खेल शतरंज का, हम तो मोहरे है
कहीं शुकुन, कहीं शिकायत भरे लहजे है
कहीं शिकन, कहीं हिदायत को सहजे है
कैसे कह दे, मोह में न कभी हम भटके है
अधूरे है सब ख्बाब, शब्दों में ही अटके है
प्यार तो है अब भी, इस जहाँ में सब कहते है
गुलदस्तों में सजे रिश्ते के फूल कहाँ महकते है
विश्वास के दामन में झूठ के तारे घनेरे चमकते है
उलझन चाँद की, अंधेर आजकल उसे धमकाते है
कितने पन्नों ने तो अपना अस्तित्व ही खो दिया है
सलीका लिखने का नहीं वक्त ने हमें बता दिया है
जिगर के हर टुकड़े ने हमें बेवजह ही रुला दिया है
न लिख पाये कुछ भी, वैसे ही सब कुछ बता दिया है
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali