शीर्षक: दरिया ऊपर चाँदनी
चाहत के सँसार में जिंदगी उधार पर चलती
हसरतों के नगर में तन्हां हो उदास सी रहती
अंदाज क्या बयाँ करे अब बिगड़ते हुए ख्यालों का
बैठे मधुशाला में हिसाब रख रहे है खाली प्यालों का
कमी ही रह गई परवरिश के तहजीबी परिधानों में
ढूंढ रहे है अब हम हकीकत को उनकी आस्तीनों में
मुकद्दर की बात है कहकर अब जरा मुस्करा लेते है
शौक जीने का है अब समझौते की सड़क पर सोते हैं
दरिया ऊपर चाँदनी सी है अब ये रुठी सी जिंदगानी
झलक की प्यास में धुंधली सी पकड़ी फिर राह पुरानी
इल्जाम नहीं मायूसियों में अफ़साने योंही लिखे जाते
दर्द दिल के है गहरे जख्मों से रिस रिस कर ही आते
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali