बढ़ाया था मैने जो हाथ अपना पकड़, मुझे समझाया नही क्यों ?
है अंश मेरा ,अनभिज्ञ हूँ मै ! खुद को मुझे समझाया नही क्यों ? है प्रेम मुझमें करे तू भी मुझसे मगर, रंग तुझको क्यों भाया नही है ? जो रंग भाये क्यों मुझमे न आये , जो आया नही तो लाया नही क्यों? है तू अनादि जो है नाद तेरा मुझे तू भला क्यों सुनाता नही है , है रब मे बैठा तू है सबमे बैठा , मुझमे तू सबरूप आया नही क्यों ? है प्रेम पीड़ा तो आनन्द क्या है, मुझे अब तलक समझाया नही क्यों ? मै साथ चाहूँ तुझे ही निबाहूँ , है ऐसी तलब पर , बढ़ाया नही क्यों , नही थी अलग न हूँ आज तुझसे , तो रूप अपना दिखाया नही क्यों? मिटना न चाहूँ मिटाती है दूरी , पाषण मे मिलाती है दूरी | मगर संग चाहूँ न मिटना मुझे है, चैतन्य होकर मिलना तुझी मे....
कविता अंश
-Ruchi Dixit