मुझे बचपन में ही ईश्वर से मिलवाया गया था
बड़े होते होते
ईश्वर को जैसा बताया गया था वैसा ना पाकर बड़े लंबे अरसे तक
मैं ईश्वर से रूठ गई थी।
उस वक्त मैंने ये जाना
जो ईश्वर से रूठे हुए हैं वही नास्तिक कहलाते है।
सयानेपन के आते आते
मैंने खोज लिया अपना ईश्वर।
तब मैंने जाना कि...
प्रेम में डूबे दो व्यक्तियों की शरारतें देखकर
ईश्वर जब हंस पड़ते हैं
तब खिलता है फ़लक पर एक मेघधनुष...
और उसी मेघधनुष का एक रंग हूं मैं!
इस तरह ईश्वर का एक अंश हूं मैं।
यह मेरी ईश्वर की परिभाषा है।
अपितु मैं अपने बच्चों को अपने ईश्वर से नहीं मिलवाऊंगी...
मैं चाहूंगी कि वह अपना ईश्वर खुद ढूंढे।
वे कभी नास्तिक ना बने।